फ़ैक न्यूज़ वह ज़हर है जो बड़ी ख़ामोशी से समाज की नसों में फैलता जा रहा है। और यह सब एक निहायत ही सोची समझी और जानी बूझी साज़िश के तहत हो रहा है। एक ज़माने में मीडिया के पास जब कोई समाचार या विचार आता था तो बारीकी से जांच परख के बाद ही उसका चयन होता था और सख़्त सम्पादन के बाद उसे मीडिया में जगह मिल पाती थी। लेकिन सोशियल मीडिया एक भीड़ भरा चौराहा है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं है ।जो चाहें लिख दें, जो चाहें बोल दें और जैसी चाहें…अफ़वहें या झूठ समाज के सामने परोस दें।यानी समाज को ऐसे ज्वालामुखी के दहाने पर बैठा दिया गया है जहां से कभी भी लावा फूट सका है और क्षणों में सब कुछ तबाह हो सकता है।

आज से बीस-पच्चीस साल पहले,इसी तरह का एक निहायत ख़तरनाक प्रयोग “ गणेशजी ने दूध पिया “ के बहाने किया गया था। वह अफ़वाह, देखते ही देखते,जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गई थी। यहां तक की अमेरिका और इंग्लैंड से भी गणेशजी के दूध पीने की ख़बरें आने लगी थीं। मंदिरों के बाहर दूध पिलानेवालों की क़तारें लग गईं थीं। दूध बेचनेवाले भी मंदिरों के आसपास पहुंच गए थे। उस आग और आंधी का मुक़ाबला एक पत्रकार यानी सुरेंद्रप्रताप सिंह ( एसपी ) ने ही किया था। एसपी उन दिनों आजतक के न्यूज़ बुलैटिन के सम्पादक और एंकर हुआ करते थे। आधे घंटे का वह न्यूज़ बुलैटिन दूरदर्शन पर दिखाया जाता था। वह एसपी का आत्मविश्वास और हिम्मत ही थी कि जिसकी बिना पर वह विपरीत हवा के ख़िलाफ़ अकेले ही खड़े हो गए थे।आजतक के कैमरों ने दिखाया था कि गणेशजी की मूर्तियों पर फूल मालाएं डाली गईं थीं ताकि गर्दन से बहता हुआ दूध दिखाई न दे।फिर मंदिर के बाहर नालियों में बहता दूध दिखाया गया।एसपी अपने स्टुडियो में विग्यान विशेषग्यों को बुलाकर चुम्बकिय आकर्षण के नियम को भी समझाया कि कैसे जब कोई तरल पदार्थ, किसी धातु के पास लाया जाता है तो धातु उसे अपनी ओर खींची है।एसपी ने इतने पुख़ता तरीक़े से उस पूरे अफ़वाह तंत्र का भांडा फोड़ा कि सबकी बोलती बंद हो गई थी और पूरा देश एक भायानक बवंडर की चपेट में आने से बच गया था।

आज देश और समाज के सामने उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक स्थिति आन खड़ी हुई है।क्योंकि सोशियल मिडिया, दरअसल कोई मीडिया नहीं है, फ़ैक न्यूज़ के संदर्भ में यह सौ सूंडवाला एक ऐसा हाथी है जिसका कोई महावत नहीं है। वक़्त पड़ने पर यह पोरस के हाथियों से भी ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सका है।

अच्छी बात यह है कि लोग होशियार हो गए हैं। कई न्यूज़ संस्थान फ़ैक न्यूज़ का भांडा फोड़ने के लिए आगे आए हैं।लेकिन सोशियल मीडिया पर किसी अच्छी या बुरी चीज़ के फैलने में कोई देर नहीं लगती है। हो यह रहा है कि जब कोई बड़ा मीडिया संस्थान अपने आधे अधूरे शोध के आधार पर किसी न्यूज़ को फ़ैक या झूठा साबित करने की कोशिश करता है तो वह आधी अधूरी जानकारी भी मिनटों में सोशियल मीडिया पर फैल जाती है और उसका भी ग़लत उपयोग होने लगता है।

इसलिए वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि जब किसी झूठे समाचार को झूठा साबित किया जाए तो उसका आधार ठोस और पूर्ण शोध हो। आधा अधूरा कुछ भी न हो। ताकि फ़ैक न्यूज़ नाम के इस ज़ेहरीले सांप का मुंह पूरी तरह कुचला जा सके।

– Parvez Ahmad
parvez@fakenewsbuster.in